कण्टकों से घर सजाना चाहता हूं।
बादलों पर घर बनाना चाहता हूं।।
इस तरह हैरान होकर देखिये मत।
दर्द में भी मुस्कुराना चाहता हूं।।
तोड़कर दिल अश्क़ जिसने दे दिये हैं।
बस उसी पर सब लुटाना चाहता हूं।।
जीतकर मुझसे खुशी तुमको मिले गर।
तो खुशी से हार जाना चाहता हूं।।
गैर कहकर के रुलाते हो मुझे तुम।
मैं तुम्हें अपना बनाना चाहता हूं।।
तोड़ दो वादे सभी, चाहे भले तुम।
हर क़सम को मैं निभाना चाहता हूं।।
आजमाओ फिर मुझे तुमको क़सम है।
'प्रिय' दुबारा टूट जाना चाहता हूं।।
ग़मों में मुस्कुराने का बहाना चाहिए।
तुम्हारी चाहतों का शामियाना चाहिए।।
न महलों की ज़रूरत है, न तख़्तोताज की।
तुम्हारे दिल के कोने में ठिकाना चाहिए।।
मेरे हिस्से की ख़ुशियां भी मुबारक़ हों तुम्हें।
मुझे गुज़रा हुआ मेरा ज़माना चाहिए।।
जहां की दौलतें, सब नेमतें ले लो तुम्हीं।
मुझे मां की दुआओं का ख़ज़ाना चाहिए।।
ज़माना रूठता है, रूठ जाये ग़म नहीं।
मुझे हर हाल में तुझको मनाना चाहिए।।
मुहब्बत नाम है रब का इसे महसूस कर।
इबादत के लिए सर भी झुकाना चाहिए।।
किसी का दिल न टूटे कर करम मेरे खुदा।
मुहब्बत के लिए खुद टूट जाना चाहिए।।
प्यार में टूटकर जो बिखर जाते हैं।
कुछ अलग इस ज़माने से कर जाते हैं।।
सोचने वाले बस सोचते रह गये।
काम करना है जिनको वो कर जाते हैं।।
हौंसले के बिना जीत आसां नहीं।
तेज़ आंधी में पर भी कतर जाते हैं।।
मायने ज़िन्दगी के समझते हैं जो।
बस वही लोग हँसकर के मर जाते हैं।।
छोड़ आये हैं मंज़िल की ख़ातिर जो घर।
छोड़कर राह को वो न घर जाते हैं।।
प्यार की मौज में खो गये जो प्रिये।
डूबकर भी वो फिर से उबर जाते हैं।।
जल गये जो धधकती हुई आग में।
स्वर्ण जैसे वही बस निखर जाते हैं।।
दिल लगाना, दिल जलाना आपकी आदत सनम।
और उस पर मुस्कुराना आपकी आदत सनम।।
रूठ जाना, मान जाना आपकी आदत सनम।
तिश्नगी दिल की बढ़ाना आपकी आदत सनम।।
तुम अगर हँस दो ख़िजां गुलज़ार होकर हँस पड़े।
पतझड़ों में गुल खिलाना आपकी आदत सनम।।
दिल धड़क उठते हजारों देखकर दिलकश अदा।
हुस्न की बिजली गिराना आपकी आदत सनम।।
देख लो जिसको नज़र भर भूल जाये वो जहां।
तीर नज़रों से चलाना आपकी आदत सनम।।
लब खुलें तो यूं लगे उमड़े लबों पर माधुरी।
जाम नज़रों से पिलाना, आपकी आदत सनम।।
प्रीत में तू आज हर हद पार कर।
'प्रिय' निगाहों से निगाहें चार कर।।
मान जा तू आज मत इन्कार कर ।
आज हर इन्कार से इन्कार कर।।
प्यार कर या मत मुझे तू प्यार कर ।
जीत जा तू इश्क़ में सब हारकर।।
ये ग़ज़ब तू सामने इक बार कर।
फिर किसी से प्यार का इज़हार कर।।
हाथ देकर के किसी के हाथ में।
फिर मुझे बेबस बहुत लाचार कर।।
गैर हूं तूने कहा कितनी दफ़ा ।।
आज मेरा होने से इन्कार कर।।
मैं छुपा लूंगा पलक में आसुओं को।
तू सितम हँसकर हजारों बार कर।।
पास आकर छीन ले चैनो सुकूं तू।
दूर जाकर ज़िन्दगी दुश्वार कर।।
लाज़िमी है जान जाये इश्क़ में।
शर्त ये है इक घड़ी बस प्यार कर।।
दो होठों की बात ग़ज़ल है।
अखियों की बरसात ग़ज़ल है।।
जब चाहत में दिल टूटे तब।
दिलपर हर आघात ग़ज़ल है।।
निखरा-निखरा नीला अम्बर।
तारों की बारात ग़ज़ल है।।
जब चन्दा हो जाये गुमसुम।
घोर अँधेरी रात ग़ज़ल है।।
रिमझिम-रिमझिम बरसे मेघा।
नेहा की सौगात ग़ज़ल है।।
रोज दामन भिगोने से क्या फ़ायदा ।
खुद को ग़म में डुबोने से क्या फ़ायदा ।।
तुम नहीं हो अगर ज़िन्दगी दर्द है।
कुछ भी पाने या खोने से क्या फ़ायदा ।।
मेरे होने की मुझको ख़बर ही नहीं।
तेरे होने न होने से क्या फ़ायदा ।
ख़्वाब भी आजकल मुझको आते नहीं।
मेरे जगने या सोने से क्या फ़ायदा ।।
जब गँवारा नहीं साथ मेरा तुम्हें।
बेवजह बोझ ढोने से क्या फ़ायदा ।।
अब फ़िकर ही नहीं है हमारी तुम्हें।
मेरे हँसने या रोने से क्या फ़ायदा ।।
एक पल भी तो नहीं आराम है।
ज़िन्दगी में काम है बस काम है।।
जब तलक ज़िन्दा रहा ताने मिले।
मर गया तो आज उसका नाम है।।
बोल मीठे बोल दो अपनी ज़ुबां से।
आपकी औक़ात से क्या काम है।।
आदमी को ग़म ने मारा इस क़दर।
हर किसी के हाथ में अब जाम है।।
फ़र्क़ आदम ने किया वो क्या करे।
है वही रहमान वो ही राम है।।
दूर आकाश में घर बनायें चलो।
चांदनी रात है गुनगुनायें चलो।।
पास रहकर भी न पास आयें चलो।
एक-दूजे को यूं आजमायें चलो।।
मुश्किलें रो पङें हौंसला देखकर।
आज से इस तरह मुस्करायें चलो।।
प्रीति की रीति से प्रीति को जोङकर।
मुक्त नभ में पतंगें उङायें चलो।।
बांध लें डोर हम बन्धनों की नई।
साथ जन्मों जनम तक निभायें चलो।।
एक पल भी सदी है, सदी एक पल।
संग रहकर हर इक पल बितायें चलो।।
मैं न मैं अब रहूं, तुम न तुम अब रहो।
एक-दूजे में यूं डूब जायें चलो।।
ख़ुशबुएं हर दिशा में घुलें प्यार की।
प्रीति का इक नगर"प्रिय" बसायें चलो।।

कि मिलकर भूल जाना तो मेरी फ़ितरत नहीं है।
तभी तो याद करने की मुझे आदत नहीं है।।
जिऊं जितना तुम्हारे साथ जी लूं ज़िन्दगी को।
मुझे सौ साल जीने की कोई चाहत नहीं है।।
मुसाफ़िर हूं मुझे हर हाल में चलना पड़ेगा।
ठहर कर राह तकने की मुझे फ़ुरसत नहीं है।।
मुझे पावों तले अपने जरा सी दे जगह मां।
जहां में दूसरी कोई कहीं जन्नत नहीं है।।
मुहब्बत है मुझे इस मुल्क़ की आबो हवा से।
वतन खुशहाल हो बस और कुछ मन्नत नहीं है।।
न हो सम्मान जिस घर में बुज़ुर्गों का जरा भी।
कि उस घर पर खुदा की तो कभी रहमत नहीं है।।
बहुत सुन्दर इमारत भी बड़ी वीरान सी लगती।
बिना बेटी किसी घर की कभी ज़ीनत नहीं है।।
कहीं पर जाति के झगड़े, कहीं है धर्म की खाई।
यकीं मानो कि इस हालात में बरक़त नहीं है।।
मेरा अहसान मानो प्यार करता हूं तुम्हें मैं।
नहीं तो सांस लेने की मुझे फ़ुरसत नहीं है।।
बहुत बेचैन है दिल,दूरियों का ग़म सताये।
बिना तेरे कहीं भी एक पल राहत नहीं है।।
रंजो ग़म दूसरों के लिया कीजिये।
इस तरह ज़िन्दगी को जिया कीजिये।।
आसुओं को छुपाने से क्या फ़ायदा ।
ये ज़हर रात-दिन मत पिया कीजिये।।
बात दिल की लबों पर भी लाया करो।
शर्म से होंठ यूं मत सिया कीजिये।।
गुफ़्तगू कर रहे हो चिराग़ों से क्यों।
चांद-तारों से बातें किया कीजिये।।
जख़्म जिसने दिये तुमको दिल तोङकर।
दर्द साझा उसी से किया कीजिये।।
याद करना किसी को भी आसान है।
भूलना हो अगर तो पिया कीजिये।।
वक़्त नहीं ज़ाया करता हूं आने- जाने में।
जाम लिए बैठा रहता,दिन भर मयख़ाने में।।
तू मय में, तू जामों में, तू ही पैमाने में।
आज असर आया है "प्रिय" अपने याराने में।।
अक्सर होता है चाहत के ताने-बाने में।
लोग मुकर जाते हैं पूरा साथ निभाने में।।
तुम रूठे, ख़ुशियां रुठी, सपने भी टूट गये।
रातें बीती करवट- करवट ख़्वाब सजाने में।।
तुम में भी मैं ही रहता हूं, जानू मैं जानूं।
जाने क्यों शर्माते हो,फिर हाथ बढ़ाने में।।
जो भी मैंने मांगा था ,रब से सब पाया है।
मेरे जैसा खुशकिस्मत है कौन ज़माने में।।
भूखा मरना तय है मेरा हर कोई कहता।
अब तक वक़्त बिताया मैंने गीत सुनाने में।।
यक़ीनन आपसे रिश्ता नहीं है।
मगर यह प्यार भी झूठा नहीं है।।

चखा है गुड़, चखी शक्कर भी मैंने।
मगर कुछ इश्क़ से मीठा नहीं है।।
उसे भी प्यार है मुझसे बहुत, पर।
न जाने किसलिए कहता नहीं है।।
शजर मत काटिये कहती गिलहरी।
तड़पता है बहुत रोता नहीं है।।
नदी को साफ रखना है ज़रुरी।
रुका है जल अभी बहता नहीं है।।
हवाओं में ज़हर घोला है हमने।
अभी भी ये मगर समझा नहीं है।।
बहुत हैं हमसे बढ़कर भी जहां में।
मगर इस सत्य को माना नहीं है।।
हवा भी रुख बदलती है, अगर परवाज़ भरता हूं।
हमेशा मुश्किलों में ही नया आग़ाज़ करता हूं।।
मुझे परवाह है तो बस हमेशा मुल्क़ की अपने।
उसी के वास्ते हर पल मैं जीता और मरता हूं।।
मेरी ये ज़िन्दगानी तो अमानत है मेरी मां की।
इबादत में वही है बस, उसी का सजदा करता हूं।।
किसी से कौल जो कर दूं, निभाता हूं उसे हरदम।
जुबां पहचान है मेरी नहीं हरग़िज मुकरता हूं।।
ग़मों ने तोड़ना चाहा मगर टूटा नहीं यारों।
हमेशा डूबकर ग़म में खुशी ले कर उबरता हूं।।
तुम्हें है या नहीं है, ये ख़बर सारे जहां को है।
मुझे तुम प्यार करते हो, तुम्हें मैं प्यार करता हूं।।
दिवाना हूं मुहब्बत में, तुम्हें मालूम हो शायद।
तुम्हारे सामने इक बार फिर इक़रार करता हूं।।

पास आ मुझको जिला दे साक़ी ।
जाम चाहत का पिला. दे साक़ी ।।
रोज बोतल से पिया करता हूं।
आज नज़रों से पिला दे साक़ी ।।
शौक़ से जां भी मेरी ले जा तू।
मेरी चाहत का सिला दे साक़ी ।।
दूरियां सारी मिटा दे आ जा।
खुद को तू मुझमें मिला दे साक़ी ।।
अब नशा मय का नहीं चढ़ता है।
चाहे मयख़ाने पिला दे साक़ी ।।
तेरी चाहत में भुलाया खुद को।
मुझको तू मुझसे मिला दे साक़ी ।
आज सीने से लगा पल भर को।
बाद में चाहे गिला दे साक़ी ।।

खुद के.होने का पता दे।
अब इरादे भी जता दे।।
हर सदा तुझको सदा दे।
रंग कुछ ऐसा जमा दे।।
रोग चाहत का लगा दे।
दर्द दे चाहे दवा दे।।
शब्द में बारुद भरकर।
आग पानी में लगा दे।।
चल हक़ीक़त की डगर पर।
और ख़्वाबों को हवा दे।।
दर्द ही दिल का सुकूं है।
ये ज़माने को बता दे