पल दो पल की खुशियां हैं, पल दो पल दुश्वारी है।
माना ये लाचारी है, काम नहीं बेकारी है।।
पांव अभी भी पथ में हैं, बढ़ने की तैयारी है।
जंग अभी भी जारी है, जंग अभी भी जारी है।।
(1)
कष्ट हजारों सह लूंगा, दुख का दामन गह लूंगा।
जी लूंगा फ़ाक़ा करके, फुटपाथों पर रह लूंगा।।
भीख नहीं मांगूं हरग़िज़, रग-रग में खुद्दारी है।।
(2)
अक्खड़पन सोचेगा जग, फक्कड़पन जानेगा जग।
मेरे आंखों के आंसू,गीतों में गूंथेगा जग।।
मेरी आशाओं का बल ,हर मुश्किल पर भारी है।।
(3)
सुख-दुख आता-जाता है, पर राही मुस्काता है।
रात अँधेरी हो कितनी, नित्य सवेरा आता है।।
इस जीवन का मूल यही, सुख-दुख बारी-बारी है।
(4)
हर मुश्किल हट जायेगी, धुंध अभी छँट जायेगी।
मंज़िल बांह पसारेगी, दूरी भी घट जायेगी।।
धरती क्या अम्बर तक की,पक्की दावेदारी है।
जंग अभी भी जारी है, जंग अभी भी जारी है।।
लाखों हैं शहर में प्रेमी मगर मुझ जैसा दिवाना कोई नहीं।
मरने के लिए ज़िन्दा हूं अभी
जीने का बहाना कोई नहीं।।
(1)
कोई आवारापन कहता, कोई दीवानापन कहता।
प्रिय मन की भाषा जाने मन, ये सासों का बन्धन कहता।।
बस तुमसे इतना कहना है, हर पल बाहों में रहना है।
अब मेरा ठिकाना कोई नहीं।
(2)
छुप-छुपकर आहें भरता हूं, पल -पल यादों में मरता हूं।
प्रिय हर दर से मांगूं तुझको, रब से फरियादें करता हूं।।
मैं मजनूं, रांझा, जोगी हूं, सब कहते तेरा रोगी हूं।
पर वैद्य पुराना कोई नहीं।
लाखों हैं शहर में प्रेमी मगर
चंचल, शोख़, जवानी में।
आग लगाती पानी में।।
जाने कैसा जादू है।
उस पगली दीवानी में।।
(1)
दिन-दिन भर फ़ाक़ा करती।
खिड़की से झ़ांका करती।।
रोज दुआओं में रब से।
बस मुझको मांगा करती।।
सच्चाई दिखती है उसकी।
नम आंखों के पानी में।।
(2)
मैं उसका हूं कहती है।
वो रग-रग में बहती है।।
मेरी ख़ुशियों की ख़ातिर।
कितने ही दुख सहती है।।
घोर समर्पण होता है।
उसकी हर मनमानी में।।
(3)
उसने सारा जग छोड़ा।
जग का हर बन्धन तोड़ा।
छोड़े सब रिश्ते-नाते।
बस मुझसे नाता जोड़ा।।
हिम्मत उसकी देखी जब से।
तब से जग हैरानी में।।
जाने कैसा जादू है....
चलते- फिरते राहों में।
जीवन गीत सुनाता हूं।।
(1)
बंजारा हूं, बंजारा
फिरता हूं मारा-मारा
जैसे पागल, आवारा
पथ में जो भी मिल जाता
अपना मीत बनाता हूं।।
(2)
कब, किसने, मुझको जाना
किसने अब तक पहचाना
सब कहते हैं दीवाना
वैरी मेरा हो जाता
ऐसे प्रीत निभाता हूं।।
(3)
माटी का कण-कण साथी
शाखा औ पाती-पाती
पुरवा,अम्बर संगाती
झरने की कल-कल से 'प्रिय'
मैं संगीत चुराता हूं।।
चलते-फिरते राहों में
जीवन गीत सुनाता हूं।।
ओ प्यारी-प्यारी मां
तू जग से न्यारी मां
तू सबसे प्यारी मां
इस जग से न्यारी मां।।
(1)
अम्बर सी ऊंचाई तुझमें
सागर सी गहराई तुझमें
धरती सा धीरज धरती है
ममता इतनी पायी तुझमें
तुझ बिन जीवन सूना-सूना
तुझ बिन है जग सूना-सूना
अब जाऊं और कहां।।
(2)
सीने से लिपटाकर तूने
अपनी बाहों की गर्मी दी
रातों-रातों थपकी देकर
कोमल हाथों की नरमी दी
पल भर झिझकी ना झुँझलायी
मेरी ख़ातिर लोरी गायी
होठों पर हरदम हां।।
(3)
तुतली बोली भी सिखलायी
जो भी मांगा वो ले आयी
नन्हीं उँगली थामी तूने
तूने ही रस्ता दिखलायी
चाहे कोई मन्दिर जाये
चाहे कोई तीरथ जाये
रब मेरा मेरी मां।।
ओ प्यारी- प्यारी मां।।।
जीवन तो गतिमय है हरपल।
चलना है, चलते जाना है।।
(1)
चाहे घोर अँधेरा घेरे
चाहे दूर भले हों डेरे
सोच समझ ले मौन चितेरे
कष्टों के बादल कम होकर
छँटना है छटते जाना है।।
(2)
ऊंचे पर्वत सी बाधाएं
मोड़ दुखों की सब धाराएं
राहें दिखलाती आशाएं
दूर किनारा तेज़ कदम चल
गिर-गिर कर बढ़ते जाना है।।
(3)
पुष्प सभी ने छांटे होंगे
पर उनमें भी कांटे होंगे
क़िस्मत ने जो बाँटे होंगे
अब कांटों से डरना कैसा
लड़ना है लड़ते जाना है।।
जीवन तो गतिमय है हरपल।
चलना है चलते जाना है।।
ठहरे-ठहरे जल में हलचल
आज हिलोरें मारे पल-पल
कैसा ये तूफ़ान उठा है
साहिल भी मझधार हुआ है
ऐसा पहली बार हुआ है।।
(1)
भीतर-भीतर एकाकीपन
दूर जगत से जाना चाहूं
प्रिय मुझ पर छाया पागलपन
जाने क्या मैं पाना चाहूं
नींद हुई है करवट में गुम
जबसे मन का तार छुआ है।।
(2)
तुम बिन सूना है जग सारा
यादों में खोया रहता हूं
नयनों का है मौन इशारा
जगकर भी सोया रहता हूं
हाल किसी से कहना मुश्किल
दिल कितना लाचार हुआ है।।
(3)
रह -रह के जियरा घबराये
अब जाना क्यों बेचैनी
क्षण भर तन्हां चैन न आये
नयनों में इक मृगनयनी है
नींद गँवायी, चैन गँवाया
'प्रिय'तब जाना प्यार हुआ है।।
ऐसा पहली बार हुआ है
इन्कार के लिए न ही तक़रार के लिए।
हर पल जिया, जिया तुम्हारे. प्यार के लिए।।
घर-द्वार के लिए न ही संसार के लिए।
ऐसा लगे कि जी रहा हूं, यार के लिए।।
(1)
खुद की ख़बर नहीं, मुझे जग की ख़बर नहीं।
जब से मिली नज़र, नज़र में ही नज़र नहीं।।
यूं बांवरा हुआ जिया, दीदार के लिए।
(2)
कहने लगा जहान सारा, जोग लग गया।
जिसकी दवा नहीं, कहीं वो रोग लग गया।।
दिल भी बिछा दिया डगर में यार के लिए।
(3)
कब हो, कहां, किसे, कभी नहीं पता लगे।
पल में लगे दुआ, कभी-कभी सज़ा लगे।।
फिर भी ज़ुबां तरस रही, इज़हार के लिए।
हर पल जिया, जिया तुम्हारे प्यार के लिए
देख लो प्रेम की तुम पराकाष्ठा।
प्रिय अगन में दहूंगा, तुम्हारे लिए।।
प्राण हो तुम हमारे, तुम्हारी क़सम।
कष्ट सारे सहूंगा तुम्हारे लिए।।
(1)
एक भी खार चुभने न पाये तुम्हें।
पंथ को इस तरह से बुहारूं सदा।।
कष्ट की धूप भी छू न पाये तुम्हें।
हर घड़ी बस तुम्हें ही निहारूं सदा।।
सांस मेरी तुम्हीं से जुड़ी है प्रिये।
इस जगत से नहीं अब मुझे वास्ता।।
दूर सबसे रहूंगा तुम्हारे लिए।
(2)
स्वप्न में तुम बसे, याद में तुम बसे।
गीत हो, प्रीत हो,मीत हो बस तुम्हीं।।
हर दुआ और फरियाद में तुम बसे।
आस, विश्वास हो, जीत हो बस तुम्हीं।।
पूजता हूं तुम्हें देवता की तरह।
आसरा हो तुम्हीं, हो तुम्हीं आस्था।।
अश्रु बनकर बहूंगा तुम्हारे लिए।
(3)
हर घड़ी बस तुम्हारे लिए ही जिया।
विष हलाहल तुम्हारे लिए ही पिया।।
लौ बनो तुम प्रिये मैं पतंगा बनूं।
क्षीर सागर बनो, नीर गंगा बनूं।।
संग हम-तुम रहेंगे, युगों-युग प्रिये।
मैं बटोही बनूं, तुम बनो रास्ता।।
अब चलूंगा, रुकूंगा तुम्हारे लिए।
देख लो प्रेम की तुम पराकाष्ठा ।।
मैं पथिक हूं, ढूंढता हूं ।
इस जगत में इक ठिकाना।।
(1)
सेज फूलों की नहीं है
कण्टकों में है बसेरा
हारकर थकना नहीं है
घेर ले चाहे अँधेरा
सांस है जब तक चलूंगा
फिर नहीं कोई बहाना।।
(2)
भाग्य की रेखा मिटी है
पांव में तक़दीर मेरी
आज अम्बर पर उभरती
दिख रही तस्वीर मेरी
आज जी भर देख लूंगा
मेघ मत उसको मिटाना।।
(3)
कर्म है भगवान जबसे
मैं सुखों को भोगता हूं
भाग्य है बलवान तबसे
अब न खुद को कोसता हूं
मैं श्रमिक हूं, श्रम करूंगा
जीत का है गीत गाना।।
मैं पथिक हूं , ढूढता हूं
इस जगत में इक ठिकाना
न जाने ज़िन्दगी में क्यों हजारों मोड़ आते हैं।
जिन्हें अपना समझते हैं, वही दिल तोड़ जाते हैं।।
(1)
कि बरसों बाद ख़त तेरा पढ़ा फिर आज चुपके से।
सिसक कर रो दिये नयना, हुई नम आंख चुपके से।।
पुरानी याद को आखर, जिया से जोड़ जाते हैं।
(2)
सज़ा ज़्यादा नहीं है क्या जरा सा दिल लगाने की।
मगर आदत हुई हमको ग़मों में मुस्कुराने की।।
बिताये साथ जो लम्हें, वही झिंझोड़ जाते हैं।
(3)
बता वो कौन सी हमसे ख़ता फिर हो गयी हमदम।
उठी है हूक सी दिल में जुदाई का सताये ग़म।।
छुड़ाकर हाथ हाथों से, अकेला छोड़ जाते हैं।
न जाने ज़िन्दगी में क्यों,हजारों मोड़ आते हैं