ज़िन्दगी की दौड़ मे बस वही आगे रहा।
     जो सदा चलता रहा, जो न बैठा हारकर।।


  वक़्त की पाबन्दियों पर जोर कब किसका चला है।
   हां मगर कोशिश ज़रुरी है, जियो जब तक जहां में।।
 

   मत डरो लड़ते रहो अधिकार अपने छीन लो।
       कुछ कदम है दूर मंज़िल फासला थोड़ा बचा है।।


   पत्थरों को चीरना आसां नहीं था।
        प्रीति के बल पर लिखा इतिहास मांझी ने।।


   फिर नये ज़ोश से इक नयी राह पर।
 चल पड़ी ज़िन्दगी मुस्कुराते हुए।।


    दर्द ही अब मुस्कुराने की वजह है।
 हार कैसे मान लूं, लड़ता रहूंगा।।


   यक़ीनन जीतना तय है।
अगर तुम साथ हो मेरे।।


   चल पड़े हैं कदम अब रुकेंगे नहीं।
   हारने -जीतने की नहीं है फ़िकर।।


   हो गयी आदत हमेशा मुस्कुराने की।
    बस यही तरक़ीब थी ग़म को हराने की।।


    रास्ता दिखला दिया है मुश्किलों ने।
     अब तो मंज़िल का ठिकाना ढूँढ़ लूंगा।।


जंग जारी है, रहेगी मुश्किलों से।
 जीत जाऊंगा मुझे बस हौंसला दो।।


 .थकन भी हार जाती है, कड़कती धूप मुरझाती।
 पसीना हौंसला देता,इरादा हो अगर पक्का।।


आस के अहसास की प्यारी सुबह है।
 चल नया अध्याय लिख दें जीत का फिर।।


कि जिन होठों पे गाली है उन्हीं से वाह निकलेगी।
अभी गुमनाम हूं, पहचान होने दो ज़माने से।।


मुश्किलें हों, दर्द भी हो,हर तरफ से हो निराशा।
तब समझ लेना कि मंज़िल कुछ कदम ही दूर है बस।।


वक़्त है कुछ कर गुज़रने का अभी, अब सोच मत कुछ।
आज है जो आज ही कर कल, नहीं आता कभी भी।।


सांस है जब तक लड़ूंगा या मरूंगा ये इरादा है।
 दर्द मेरी जीत का ऐलान है, फिर हार क्यों मानूं।।


ज़ख्म अब तक है हरा ही,आज तक सूखा नहीं।
ये जुनूं है, ये सुकूं है, राज है ये जीत का।


   आह ग़ज़ल लिखवाती है हर दर्द कहानी लिखता है।
मैं तो चुप हूं, मेरी नम आंखों का पानी लिखता है।।


पांव हैं राह में मंज़िल पे नज़र रखते हैं।
 हार को जीत बनाने का हुनर रखते हैं।।


ज़िन्दगी का बड़ा ही अजब फलसफ़ा।
रोज़ मेयार इसके बदलते रहे।।


तालियों से भूख मिटती है हमारी।
आसुओं को पी के करते हैं गुजारा।।


हजारों बोतलें पीकर मुझे कुछ भी नहीं होता।
 नशा मेरा, मेरे ग़म के सिवा कोई नहीं यारो।।


खुदा का नूर बरसा है,इनायत हो गयी मुझ पर।
   नहीं तो मैं कहां जाहिल, कहां ये शायरी का फ़न।।


अगर इस ज़िन्दगी में इतने सारे ग़म नहीं होते।
 यकीं मानो मेरे यारों, कभी हम , हम नहीं होते।।


ज़िन्दगी का कौन सा ये फलसफ़ा है।
आदमी अब आदमी से ही खफ़ा है।।


   आजकल का आदमी क्या आदमी है।
 आदमी में, आदमीपन की कमी है।।


कल्पनाओं के सहारे चल पड़ा उड़ने गगन तक।
      हौंसला कुछ कर दिखाने का बहुत ऊंचाइयों तक।।


जब दर्द की हो इन्तिहां,हो साथ ग़म का कारवां।
   तब हौंसले के साथ चल, कदमों में होगा आसमां।।


         अब तलक अन्जान था,खुद से, खुदा से, इस जहां से।
 रू ब रू खुद से हुआ, तब समझ पाया सभी को।।


न वो वादे, न वो क़समें, न वो रिश्ता, न वो सपने।
न जाने क्यों पराया हो गया,दिल से जुड़ा था जो।।


   आदमी के रंग गिरगिट से भी ज़्यादा।
नित नये अंदाज़ मिलते देखने को।।


बात क्या है किसलिए नाराज हो तुम।
 एक भी हिचकी नहीं आयी अभी तक।।


दोपहर की धूप में, मीलों चले, तुमसे मिले।।.
  छांव से प्यारा लगा, अहसास सांची प्रीति का



मुहब्बत शायरी से है, इबादत शायरी की, की।
न जाने हुस्न वाले क्यों समझ बैठे खुदा खुद को।।


   हमेशा याद में,हर ख़्वाब में, सूरत उसी की है।
मुझे मालूम है ये, वो कभी मेरा नहीं होगा।।


मुझे उसने खरीदा यूं, दुबारा बिक नहीं पाया।
     मगर हर अश्क़ का वो शौक़ से व्यापार करता है।।


उसे हक़ है मुझे रुसवा करे, दिल तोड़ दे वो।
मगर मेरी वफ़ाओं का, मुझे कुछ तो सिला दे।।


ज़माने को दिखाने के लिए।
     चली आ दिल दुखाने के लिए।।


मुहब्बत में किसी से भी अदावत क्या।
       कि सारा दोष है दिल का, शिकायत क्या।।


कुछ बहाना ही न था तो, ये कहा उसने।
      झूठ कहते हो कि मुझसे प्यार करते हो।।


लोग कहते हैं दिवाना हो गया है।
    और उसने कह दिया मैं बेवफ़ा हूं।।


चलो हद से गुजर कर देखते हैं।
    उसे फिर आज जी भर देखते हैं।।


          झुकाकर के नज़र अपनी बढ़ा मत बेक़रारी को।
 मुझे दीदार करने दे, जरा सा चैन आने दे।।


मुस्कुरा कर मत सता तू दूर से।
          पास आकर हाल दिल का सुन जरा।।


  इश्क़ करना ज़ुर्म है, हुस्न ने दिल से कहा।
 और दिल ने ये कहा, हर सज़ा मंज़ूर है।।


   अब दवाओं की ज़रूरत क्या।
               दर्द मरहम बन गया हर ज़ख्म का।।


  मुश्किलें सब राह से हटने लगीं हैं अब।
 जीतना तय है, दुआएं भेज दीं मां ने।।


दूरियों का फासला हम इस तरह से तय करें।
 इक कदम जब हम चलें, तो इक कदम तुम भी चलो।।


   रास्ते हैं जुदा,मंज़िलें हैं जुदा।
    साथ चलना हमारा मुनासिब नहीं।।


  करवटें लेने लगीं हैं,आज दिल की ख़्वाहिशें।
 प्रिय तुम्हारी याद में फिर नींद कोसों दूर है


   भरोसा दे गया था आज फिर सपने में आने का।
बड़ी कमबख़्त हैं यादें, मुझे सोने नहीं देतीं।।


        किस तरह से रात गुजरी पूछ मत तू।
ज़िन्दगी कैसे कटेगी ये बता दे।।


   तुम्हारा नाम क्या है, पूछ बैठा आज वो हँसकर।
लिखे थे ख़त मुझे जिसने, मुहब्बत के लिए छुपकर।।


लोग जब हम पर बहुत हँसने लगे।
 आसुओं से हम ग़ज़ल लिखने लगे।।


जलन तलवों के छालों की, वो जाने भी भला कैसे।
कि जिसने धूप में पैदल कभी चलकर नहीं देखा।।


हर ग़मीं में ढूढ़ ले तू इक ख़ुशी।
 ज़िन्दगी में दर्द है, बस दर्द है।।


 मैं तुझे आवाज़ दूं फिर, और मुड़कर मुस्कुरा तू।।


एक मैं हूं बस उसे ही देखता रहता सदा।
      एक वो है जो बिना देखे सताता हर घड़ी।।


जिसे बर्बाद करना हो, उसे खुद ढूंढ लेता है।
अजब ये इश्क़ है यारों, अलग ही रंग है इसका।।


कसक भी है, जलन भी है, घुटन भी है, मगर ख़ुश हूं।
तुम्हारे दर्द मिल जाते मुझे तो और ख़ुश होता।।


हर ज़िद को पूरा करती है, होठों पर बस हां होती है।
हां ऐसी ही मां होती है, हां ऐसी ही मां होती है।।


महल कितने बने टूटे, बिखर कर हो गये मिट्टी।
घरौंदे की ज़रूरत क्या, रहेंगे दिल में लोगों के।।


ग़मीं ने, बेबसी ने जब बहुत नाक़ाम कर डाला।
हमारे गांव वालों ने, हमें बदनाम कर डाला।।


न मन्दिर में, न मस्जिद में, न पत्थर में।
मेरा भगवान मेरी मां, मेरे घर में।।


पत्थरों को पूजकर मैं क्या करूं।
 इस जहां में मां से बढ़कर कौन है।।


 यदि न होती तुम धरा पर, शून्य होता ये जगत।
इसलिए ही पूज्य हो, भगवान से बढ़कर हो मां।।


आज से ऐलान कर हर सांस है मेरे लिए।
 मैं जियूं तेरे लिए, तू जिये मेरे लिए।।


 तुम्हारा हाथ थामा है, फनां होकर भले छूटे।
वचन जो भी दिये तुमको, यक़ीनन सब निभाऊंगा।।


   दर्द ही अब मुस्कुराने की वजह है।
हार कैसे मान लूं, लड़ता रहूंगा।।


गैर होकर तुम हमारे हो गये।
   ये सिला है सब वफ़ाओं का मेरी।।


     सांस की रफ़्तार हो तुम, और इस दिल का सुकूं।
बस तुम्हें सोचूं, तुम्हें चाहूं, तुम्हें पूजूं सदा।।


जो न समझे दर्द जनता का जरा सा भी।
    वो सियासत ही बदल डालो, कुचल डालो।।


हो गये मशहूर मेरे शेर यूं।
लोग मेरे नाम से जलने लगे।।


खून के छींटे हवा में उड़ रहे हैं।
      हद हुई हम सब अभी तक मौन हैं।।


गैर को अपना बनाने में।
टूटते हैं घर ज़माने में।।


हार जाता मैं अगर तो ग़म नहीं होता।
 बस यही अफसोस है, विश्वास हारा है।।


        काश तुमसा हमसफ़र सबको मिले जग में।
सिर्फ़ खुशियां ही न बांटे, दर्द भी बांटे।।


यकीं अब भी नहीं होता हमारे हो चुके हो तुम।
वजह क्या है कि सबको छोड़कर हमको चुना तुमने।।


 अब हमेशा के लिए तुम मिल गये हो।
सिलसिला चलता रहे जन्मों- जनम तक।।


   तू फगुनिया की तरह विश्वास रख मुझ पर।
और मांझी की तरह मैं ख़्वाब सच कर दूं।।


ख़ुश रहो हर हाल में मेरी दुआ है.
    आसमां आकर तुम्हारे पांव चूमे।।


ज़ुर्म तुमने तय किया है, अब सज़ा भी दो।
 ताकि दुनिया का असल अंदाज़ मैं जानूं।।


बेवजह जब लोग मेरे नाम से जलने लगे।
तब यकीं आया मुझे, नाचीज़ हूं पर खास हूं।.


मजबूरियों की दास्तां किसने सुनी, किसने पढ़ी।
 कुछ हँस दिये, कुछ रो दिये, कुछ खुद में ही उलझे रहे।।


हम समय की धार के हैं दो किनारे।
दूर रहना ही हमारा भाग्य है अब।।


 कुछ नहीं है पास मेरे, ये मुझे अहसास है।
दर्द मेरे पास था, दर्द मेरे पास है।।



दौलतें तुमको मुबारक़ हों।
    हम दिलों पर राज करते हैं।।


गल्तियों की कर बुराई शौक़ से पर।
    खूबियों की भी कभी तारीफ़ तो कर।।


कभी नाराज होकर के, कभी नज़रें झुकाकर के।
   जताया प्यार जो तुमने, अभी तक सुर्ख़ियों में है।।


दाग़ दामन का हमारे बिन धुले ही धुल गया।
जब हमारे नाम का चर्चा हवा में घुल गया।।


    तन्त्र है बिखरा हुआ, अब लोक धू-धू जल रहा।
राम जाने देश ये किसके भरोसे चल रहा।।


एक मकसद मिल गया सूखे लबों पर है हँसी।
   ज़िन्दगी भाने लगी जबसे मिले हो तुम मुझे।।


वक़्त बदला, लोग बदले, और बदला है जहां।
आइने में आज देखा, मैं वही हूं , हां वही।।


रूठ जाता हूं हमेशा इसलिए।
     वो मना लेगी मुझे हर हाल में।।


दर्द की लय पय थिरक कर, आसुओं में आस ढूंढी।
हमसफ़र मेरा जुनूं है, कारवां विश्वास मेरा।।


जुनूं है जीतने का, ज़िद न रुकने की हमेशा से।
 हमारे तेवरों को देखकर मुश्किल ठहरती है।।


लाख समझाया मगर समझे न वो।
 इसलिए समझा रहे हैं, खुद को ही।।


खेत, धन, दौलत बटेंगे,और बूढ़ी मां बटेगी।
 आज से आंगन न होगा, आज से घर, घर न होगा।।
 

 ज़िस्म में तुम, रूह में तुम, ये यकीं कैसे दिलाऊं।
 माफ़ कर देना मुझे, कोई ख़ता गर हो गयी हो।।


            जो किसी काबिल नहीं हैं, वो निज़ामत कर रहे हैं।
गीदड़ों के झुण्ड शेरों पर हुक़ूमत कर रहे हैं


एक जुगनू की चमक से डर रहा है वो।
 नाम है सूरज मगर है, खुद अँधेरे में।।